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‘शोध-चिंतन पत्रिका’ और ‘लौहित्य साहित्य सेतु’ का लोकार्पण

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पूर्वोत्तर भारत की ई-पत्रिका द्वय ‘शोध-चिंतन पत्रिका’ और ‘लौहित्य साहित्य सेतु’  के प्रवेशांक (जूलाई-दिसंबर,2020) का लोकार्पण अनुष्ठान आज सम्पन्न हुआ। गूगल मीट के जरिए आयोजित इस कार्यक्रम में पूर्वोत्तर भारत के साथ देश-विदेश के कई विद्वानों, अध्यापकों एवं शोधार्थियों ने हिस्सा लिया। ई-पत्रिका द्वय का लोकार्पण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सदस्य डॉ. किरण हाजरिका द्वारा हुआ। उन्होंने अपने भाषण में इन दो पत्रिकाओं के प्रवेशांक में उपलब्ध विषय-वैविध्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पूर्वोत्तर भारत जैसे अहिंदी भाषी क्षेत्र से हिन्दी की ई-पत्रिकाओं का प्रकाशन बहुत ही महत्वपूर्ण है।   कार्यक्रम में भाग लेते हुए यूरोपियन यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंड बेस्ट, द हेग के भूतपूर्व कुलपति प्रो. मोहनकांत गौतम ने जनजातीय साहित्य के शोध पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर भारत मूलतः जनजातियों का क्षेत्र है और आदिवासियों को साथ लेकर चलना और उनकी बोलियों का व्याकरण लिखना युग की मांग है। भारत की संस्कृति के साथ हिन्दी को आगे ले जाना चाहिए। पूर्वोत्तर भारत के हिन्दी साहित्यकारों के साहित्य को भारत के बाहर ले जाना आवश्यक है। भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के अध्यक्ष सुरेश चंद्र शुक्ल ने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि दोनों पत्रिकाएँ पूर्वोत्तर भारत को जानने का माध्यम होंगी तथा इन दो पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार विश्व स्तर पर होना चाहिए। ई-पत्रिकाओं के प्रकाशन पर खुशी ज़ाहिर करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर मोहन ने कहा कि साहित्य सर्जना में भाषा के अध्ययन की आवश्यकता है। इन पत्रिकाओं का प्रकाशन सराहणीय प्रयास है। इससे पूर्वोत्तर के हिन्दी लेखकों को पहचान मिलेगी। केंद्रीय बौद्ध विद्या संस्थान(मानद विश्वविद्यालय) के प्राध्यापक डॉ. राहुल देव मिश्र ने पत्रिकाओं को साहित्य की नवीन स्थापना कहा। सरकारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पालि के अध्यापक दुर्गा प्रसाद सिंह ने कहा कि पत्रिकाओं के प्रकाशन के प्रयास से किसी न किसी रूप में शोधार्थियों एवं लेखकों का विकास होगा। पूर्वोत्तर से शेष भारत अच्छी तरह परिचित नहीं है। इन ई-पत्रिकाओं के माध्यम से बाहरी क्षेत्र के लोग पूर्वोत्तर को जान सकेंगे। पत्रिकाओं के साथ जो लोग जुड़े हैं, कहीं न कहीं वे समृद्ध हो रहे हैं। इनकी प्रस्तुति में जो सीख मिलेगी, वह अति महत्वपूर्ण है। गौहाटी विश्वविद्यालय के असमीया विभाग के अध्यक्ष अध्यापक बिभा भराली ने वर्तमान समय में अर्धवार्षिक ई-पत्रिकाओं की प्रासंगिकता पर प्रकाशा डाला। आपने कहा कि ऐसी पत्रिकाएँ पूर्वोत्तर भारत के बौद्धिक क्षेत्र में जागरण का संचार करेंगी। इनसे साहित्य-चर्चा से जुड़े लोगों की सर्जनात्मकता का विकास होगा। प्रागज्योतिष महाविद्यालय,गुवाहाटी के असमीया विभाग के सहयोगी अध्यापक डॉ. बैकुंठ राजवंशी ने पत्रिकाओं को देशा-विदेश के व्यक्तियों के चिंतन की अभिव्यक्ति का मंच बताया। पत्रिकाओं के लोकार्पण का यह दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगा। वर्तमान का समय भारतीय भाषा एवं साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण समय है। ये पत्रिकाएँ भाषा-साहित्य के साथ-साथ मानव सभ्यता के लिए भी महत्वपूर्ण देन हैं। इस कार्यक्रम के संचालन की ज़िम्मेदारी डॉ. रीतामणि वैश्य ने संभाली। कार्यक्रम में गौहाटी विश्वविद्यालय के भूतपूर्व सहयोगी अध्यापक डॉ. अच्युत शर्मा, कॉटन विश्वविद्यालय,गुवाहाटी के सहकारी अध्यापक डॉ. परिस्मिता बरदलै और विद्या दास , हिंदी शासकीय महाविद्यालय, भैंसा के सहायक अध्यापक डॉ. पवन कुमार, एन. एस. एस. हिन्दू कॉलेज की सहायक आचार्य डॉ. लेखा एम., कॉलनिय विश्वविद्यालय, श्रीलंका के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रवक्ता डॉ. अनूषा निल्मिणी सल्वतुर, नगाँव महाविद्यालय,असम की  सहकारी अध्यापिका पूजा बरुवा, पांडु महाविद्यालय के अतिथि अध्यापक उदिप्त तालुकदार, असम सरकारी हिंदी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की प्रवक्ता जयश्री काकति, दुमदुमा  महाविद्यालय,असम के सहायक अध्यापक हिरण वैश्य, प्रागज्योतिष महाविद्यालय, असम के हिंदी विभाग के सहायक अध्यापक करबी खेरकतारी बड़ो समेत कई विद्वान, शोधार्थी तथा विद्यार्थी जुड़े। गौहाटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के सहयोगी अध्यापक डॉ. रीतामणि वैश्य के संपादन में प्रकाशित ‘शोध-चिंतन पत्रिका’ सहयोगी विद्वानों द्वारा समीक्षित अर्धवार्षिक हिंदी ई शोध पत्रिका है तथा ‘लौहित्य साहित्य सेतु’ सहयोगी विद्वानों द्वारा पुनरीक्षित अर्धवार्षिक द्विभाषिक ई-पत्रिका है। प्रागज्योतिष महाविद्यालय, असम के हिंदी विभाग के सहायक अध्यापक डॉ. प्रीति बैश्य ‘लौहित्य साहित्य सेतु’ के संपादक हैं। डॉ. रीतामणि वैश्य ने ‘शोध-चिंतन पत्रिका’ के प्रकाशन के उद्देश्य की व्याख्या करते हुए कहा कि इस पत्रिका के माध्यम से शोध के मानक एवं मौलिक लेखन को प्रोत्साहित किया जायेगा। वही ‘लौहित्य साहित्य सेतु’ के संपादक डॉ. प्रीति बैश्य ने इस पत्रिका के माध्यम से हिंदी तथा असमीया भाषा में मूलतः असम की कला, साहित्य, संस्कृति के प्रचार-प्रसार की बात रखी।           

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